नईदुनिया वेबसाइट के सौजन्य से @ छठ पूजा का त्योहार पूर्वोत्तर भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश व नेपाल में मुख्य रूप से प्रचलित है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र दरभंगा में इस पर्व का विशेष महत्व है। हालांकि, अब यह त्योहार पूरे देशभर में मनाया जाने लगा है। छठ के तीसरे दिन यानी 13 नवंबर को डूबते हुए सूर्य की पूजा फिर अंतिम दिन 14 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं। 13 नवंबर को संध्या अर्घ्य का मुहूर्त सूर्यास्त के समय 17:28:46 बजे हैं। वहीं, 14 नवंबर को उषा अर्घ्य का मुहूर्त सूर्योदय के समय 06:42:31 बजे है। संध्या अर्घ्य के लिए बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रत रखने वाले परिवार के साथ अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य देने के लिए नदी, तालाब या घाट में जाते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। वहीं, उषा अर्घ्य (14 नवंबर) को उदय हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रति उसी जगह पर फिर से जमा होते हैं, जहां उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। संध्या अर्घ्य की सारी प्रक्रिया फिर से दोहराई जाती है। पूजा के बाद व्रत रखने वाले कच्चे दूध का शरबत पीकर व्रत पूर्ण करते हैं। छठ पूजा का पौराणिक महत्व मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। ऐसी ही एक अन्य मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। छठ पर्व सूर्य षष्ठी व डाला छठ के नाम से जाना जाता है। षष्ठी तिथि को मनाया जाने के कारण छठ पर्व कहते हैं। इस पर्व में सूर्य की पूजा की जाने की वजह से इस त्योहार को सूर्य षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।
जानिए इसका पौराणिक महत्व व पूजा का मुहूर्त




