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महर्षि दयानंद ने ऐसे किया महर्षि श्रद्धानंद का ह्दय परिवर्तन

जगह-जगह लोगों को संदेश देते हुए संवत 1936 को क्रांति के अग्रदूत महर्षि दयानंद बरेली पधारे। मुंशीराम के पिता नानकचंदजी को आदेश मिला कि पंडित दयानंद सरस्वती के व्याखायानों में कोई उपद्रव न हो, ऐसा प्रबंध करें। प्रबंध करने के लिए वह स्वयं सभा में गए और महर्षि के व्याख्यान से बड़े प्रभावित हुए और उनके साथ ही उनको यह विश्वास हो गया कि उनके नास्तिक पुत्र की संशय निवृत्ति उनके सत्संग में हो जाएगी। घर आकर उन्होंने मुंशीराम से कहा, 'बेटा! मुंशीराम एक दंडी संन्यासी आए हुए हैं। बड़े विद्वान और योगिराज हैं। उनकी बातें सुनकर तुम्हारे संशय दूर हो जाएंगे। कल मेरे साथ चलना। मुंशीराम व्याख्यान सुनने जाते हैं और उनका ह्दय महर्षि की ओर आकर्षित होता जाता था, जैसे की भटके हुए जहाज का कप्तान प्रकाश स्तंभ का प्रकाश पाकर तीव्रता से आगे बढ़ जाता है। उस दिन का व्याख्यान परमात्मा के निज नाम ओम पर था। व्याख्यान के संबंध में मुंशीराम, जो बाद में स्वामी श्रद्धानंद कहलाए, ने लिखा है,' वह पहले दिन का आत्मिक आल्हाद कभी भूल नहीं सकता। नास्तिक रहते हुए भी आत्मिक आल्हाद में निमग्न कर देना ऋषि आत्मा का ही काम था।' बोलने की कला सबको नहीं आती, लेकिन जिसको आती है, उनकी बात सुनकर कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। सच तो यह है कि सुंदर कंठ और सुंदर बोली प्रकृति का अनोखा उपहार है, जो बिरले को ही मिलता है। इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनमें एक बात समान दिखाई देती है कि वे सभी अच्छे वक्ता रहे हैं। संतों का तो यह एक विशेष आभूषण रहा है। लोग उनकी बात इसलिए सुनते और मानते है। वे अपनी वाककला से लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। आखिर बोली ही तो आदमी की पहली पहचान है।

मालवांचल

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