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अभिलाषा तिवारी की रिपोर्ट@ 1857 की क्रांति के महासमर में राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ सिंह के बलिदान दिवस का इतिहास।

जनजातीय नायक और धार्मिक आस्था
18 सितम्‍बर राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह बलिदान दिवस पर विशेष। 
सन् 1857 के महासमर में अपने प्राणों की आहुति देने वाले राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह, गोंडवाना के गोंड राजवंश के प्रतापी राजा थे जो इस क्रांति में जबलपुर का नेतृत्व करते हुए अपनी आराध्य देवी काली चंडी की स्तुति में कविता लिखी जिसका उद्देश्य अपनी प्रजा में धार्मिक और देशभक्ति का भाव जगाने के साथ साथ  अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष का संदेश छुपा था। कविता की पक्तियां इस प्रकार है-
“मूंद मुख डंडिन को चुगलौ को चबाई खाई
खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघारिका
मार अंगरेज, रेज कर देइ मात चंडी
बचै नहिं बैरी-बाल-बच्चे संघारका ।।
संकर की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर
दीन की पुकार सुन अय मात कालका
खाइले मलेछन को, देर नहीं करौ मात
भच्छन कर तत्छन बेग घौर मत कालिका ।।”
अंग्रेजों ने इसे देशद्रोही लेखन माना और पिता-पुत्र को देशद्रोही घोषित करते हुए 18 सितम्बर 1857 को अत्यंत निर्ममता से तोप से बांधकर उड़ा दिया । ये कविता जनजातीय नायकों के राष्ट्र प्रेम, आध्यात्म एवं धार्मिक आस्था का केन्द्र उस देवी शक्ति से प्रेरणा लेकर लिखी गई जो आज भी  जबलपुर में गढ़ा पुरवा में "मां माला देवी मंदिर" के नाम से प्रख्यात हैं जो रानी दुर्गावती के वंशजों की कुलदेवी हैं। आदिवासी पूरखों द्वारा देवी काली चंडी की आराधना इस बात का प्रतीक है कि आदिवासी प्राचीन काल से ही शक्ति की प्रतीक " देवी " को अपनी आराध्या कुलदेवी मानते है जो सीधे सनातन धर्म की शक्ति परंपरा से जुड़े हैं । जबकि वर्तमान में आदिवासी की धार्मिक आस्‍था को लेकर भ्रमित करने का कार्य किया जा रहा है। कुछ आदिवासियों द्वारा अपने ही समाज के पूरखों की धार्मिक आस्था पर  प्रश्नचिन्ह लागा कर समाज की आध्यात्मिक अस्मिता को खत्‍म करने और जनजातीय समाज को बाटने  का प्रयास हो रहा हैं। स्‍वतंत्रता के कई वर्षों के बाद जनजातीय समाज के नायकों को  स्वतंत्रता आन्दोलन में दिये योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल पायी है। वही तुष्‍टीकरण की राजनीति विचारधारा समाज के बलिदानी नायकों की धार्मिक आस्‍था पर प्रश्‍न खड़े कर इन नायकों के उस गौरवपूर्ण भाव को समाप्‍त करने का षडयंत्र है जिन पर आज जनजातीय समाज गर्व कर रहा है। ऐसी परिस्थिति में समाज का दायित्व हैं कि अपने पुरखों का राष्ट्र के प्रति समर्पण, उनकी संस्कृति, आध्यात्मिक एवं धार्मिक आस्था को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ी को सौपें। यहीं राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को उनके बलिदान दिवस पर सच्ची श्रृद्धांजलि होगी ।

डॉ दीपमाला रावत
विषय विशेषज्ञ
जनजातीय प्रकोष्‍ठ, राजभवन

मालवांचल

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