नीमच के उत्कृष्ट सीनियर बॉयज हॉस्टल के अधीक्षक हरीश चौहान को लोकायुक्त पुलिस ने ₹1 लाख की घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इस कार्रवाई को सोमवार को 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन आदिम जाति कल्याण विभाग ने आरोपी अधीक्षक को अब तक सस्पेंड नहीं किया है। विभाग के इस ढीले रवैये पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि यही विभाग छोटी-मोटी गलतियों पर भी अधीक्षकों को तुरंत सस्पेंड कर देता है।
लोकायुक्त उज्जैन की टीम ने हरीश चौहान को 25 जून को जिला संयोजक कार्यालय से रिश्वत लेते हुए दबोचा था। इसके बाद, 1 जुलाई को विभाग ने उन्हें हटाने और कॉलेज हॉस्टल के अधीक्षक चंद्रशेखर राठौर को अतिरिक्त प्रभार सौंपने का आदेश जारी किया।
विभागीय आदेश होने के बावजूद हरीश चौहान कई दिनों तक अपनी कुर्सी पर जमे रहे और सोमवार सुबह ही उन्होंने अपना चार्ज नए अधीक्षक को सौंपा। चार्ज सौंपने में हुई इस देरी ने विभाग के काम करने के तरीके पर शक पैदा कर दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस 10 दिन की देरी का फायदा उठाकर हॉस्टल के रिकॉर्ड, पैसों से जुड़े कागजातों और स्टोर के सामान में हेरफेर की गई है, ताकि पुराने घपलों को छुपाया जा सके। आरोपी अधीक्षक हरीश चौहान साथी कर्मचारियों पर धौंस जमाता था कि वह राकेश राठौर को उज्जैन का डिप्टी कमिश्नर बनवाकर लाएगा और फिर विरोध करने वालों की नौकरी खा जाएगा। हरीश चौहान का विवादों से पुराना नाता रहा है। इससे पहले एक गर्ल्स हॉस्टल की दो नाबालिग लड़कियों ने उन पर एट्रोसिटी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन राजनैतिक पहुंच के चलते वह बच निकला।विभागीय सूत्रों के मुताबिक, आदिम जाति कल्याण विभाग के पूर्व जिला संयोजक राकेश राठौर और आरोपी अधीक्षक हरीश चौहान का एक 'सिंडिकेट' पिछले 7 सालों से एक्टिव था। आरोप है कि यह गुट दूसरे अधीक्षकों के खिलाफ झूठी शिकायतें करवाकर उन्हें डराता था और फिर जिला दफ्तर बुलाकर उनसे मोटी वसूली करता था।इस सिंडिकेट ने विभाग के 7 अधीक्षकों से प्रमोशन की फाइलें आगे बढ़ाने के बदले ₹25-₹25 हजार वसूले थे। इसके अलावा, तबादलों के बाद कटे हुए वेतन को जारी कराने, छोटे कर्मचारियों की तनख्वाह क्लियर कराने और ट्रांसफर होने के बाद भी पुरानी जगह पर रोके रखने के लिए मोटी रकम ली गई थी।




