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सोशल मीडिया पर वायरल हुआ मैसेज, देशभक्ति दिखाने की मची होड़

(कपिल शर्मा) । हमारा भारत देश को त्योहारों का देश कहा जाता हैं क्योंकि यहाँ पर पर्व या त्यौहार आते जाते रहते हैं लेकिन कुछ लोग बचे हुए दिनों में भी त्योहारों को मनाने की लालसा रखते हैं या तो वो जानकारी के अभाव में या देखा देखी की भक्ति में। ऐसी ही घटना 14 फरवरी को देखने को मिली। इस दिन एक मैसेज खूब वायरल हुआ जिसमें शहीद दिवस मनाने की हिदायत दी गई व शहीद- ए -आज़म भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव की फांसी की सजा का दिन बताया गया और इस संदेश में बची कसर यह लिखकर पूरी कर दी कि "यह बात युवा पीढ़ी को शायद कम पता है।" देशभक्ति दिखाने में मची होड़ को लेकर युवा वर्ग व सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बड़े असमंजस नज़र आए कोई इस मैसेज की पुष्टि करता देखा गया तो कोई महज कॉपी पेस्ट करके इस मैसेज को फैलाने की भूमिका निभाते हुए नजर आया। हालांकि यह बात इतनी बड़ी नही है कि तूल पकड़े लेकिन इस बात से ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि फैलती अफवाहों की संख्या में कितनी वृद्धि हो रही हैं। इन अपुष्ट जानकारियों के फैलाने पर अंकुश लगना चाहिए वरन आगामी दिनों में इसका रूप और कितना भयावह हो जाएगा। "पिछले वर्ष भी हुआ था वायरल"--- यह संदेश 14 फरवरी के आसपास के दिनों में बहुत ही देखा जाता हैं और पिछले वर्ष भी यह मैसेज खूब वायरल हुआ था। इस संदेश को कई मीडिया रिपोर्ट्स ने झूठा साबित किया गया है। "यह है वायरल मेसेज"---- 14 फरवरी का सच करोड़ो भारतीय 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे मनाते हैं पर बहुत ही कम युवा पीढ़ी इस सच को जानते हैं कि इसी दिन अमर शहीद भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई थी आज यह बात युवा पीढ़ी को शायद कम पता है इसलिए इस संदेश को इतना फैला दो कि 14 फरवरी को हर हिंदुस्तानी वेलेंटाइन डे को भुलाकर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रृद्धांजली दे और भारतीय संस्कृति को बनाए रखें। "23 मार्च को हुई थी फाँसी" ----- ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 14 फरवरी को फांसी नहीं दी गई थी, बल्कि उन्हें 23 मार्च को फांसी दी गई थी। 23 मार्च को पूरा देश "शहीद दिवस" के रूप में भी मनाता है। कई रिपोर्ट्स में यह जिक्र जरूर है कि इन तीन महान क्रांतिकारियों को फांसी देने की तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी, लेकिन अचानक ही उनकी फांसी का समय बदल कर 11 घंटे पहले कर दिया गया और 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में शाम 7:30 बजे उन्हें फांसी दे दी गई। "इतिहासकारों की नज़र में 14 फरवरी का महत्व"---- कई इतिहास के जानकारों का कहना है कि 14 फरवरी से भगत सिंह का रिश्ता ये है कि 14 फरवरी 1931 को मदन मोहन मालवीय जी ने फांसी से ठीक 41 दिन पहले एक मर्सी पिटीशन ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन के दफ्तर में डाली थी, जिसको इरविन ने खारिज कर दिया था हालांकि कई रिपोर्ट्स का कहना है कि इतिहास में ऐसे भी किसी दावे की पुष्टि नहीं होती।

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