अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के लिए पाकिस्तान में बातचीत शुरू हुई है, जिसमें कई मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री शामिल हैं। हालांकि ईरान सीधे संवाद से इनकार कर रहा है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ता जा रहा है। जंग के कारण दुनिया पर आर्थिक दबाव बढ़ने लगा है।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के लिए रविवार को पाकिस्तान में बातचीत शुरू हो गई। सऊदी अरब, तुर्किये और इजिप्ट के विदेश मंत्री भी इस्लामाबाद पहुंचे हैं। एक दिन पहले यानी शनिवार को अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भरोसा जताया था कि युद्ध कुछ हफ्तों में खत्म हो जाएगा। पश्चिम एशिया में बढ़ती अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी से जुड़ी चिंताओं को भी उन्होंने यह कहकर खारिज कर दिया था कि युद्ध में थल सेना की जरूरत नहीं पड़ेगी।
यह पूरा सीन उम्मीदें जगाने वाला भी लगता है, लेकिन इसके साथ कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। ईरान ने अमेरिका से सीधे बातचीत से इनकार कर दिया है, यानी अब दोनों के बीच संवाद के लिए कोई तीसरा पक्ष सामने आएगा। अमेरिका ने समझौते के लिए जो शर्तें रखी हैं, ईरान उससे इनकार करता आ रहा है। सऊदी अरब का रुख भी अहम रहेगा, क्योंकि खबरें हैं कि वह ईरान पर अमेरिकी हमले के समर्थन में भी था।
फिर शनिवार को ईरान समर्थित हूती विद्रोही भी जंग में शामिल हो गए, जिससे स्थिति और जटिल हो गई। इस्राइल भले ही कह रहा है कि वह कई मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार है, लेकिन हालात पहले से अलग और चुनौतीपूर्ण हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ टकराव जारी है, जबकि गाजा में भी बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधन लगे हुए हैं। ऐसे में इस्राइल पर दबाव और बढ़ता दिख रहा है।
इस लड़ाई का दुनिया पर बुरा असर पड़ रहा है। यूं तो डॉनल्ड ट्रंप दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से अमेरिका पर फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन वहां गैस के दाम 35% तक बढ़ चुके हैं, जबकि यूरोप में 80% तक। यह मामूली बात नहीं कि ट्रंप को सत्ता संभाले सवा साल भी नहीं हुए और उन्हें तीसरी 'नो किंग्स रैली' का सामना करना पड़ा। इस बार ट्रंप विरोधी विरोध-प्रदर्शन पूरे अमेरिका के अलावा यूरोप के कई देशों में भी हुए।





