पाली/ढीमरखेड़ा एक ओर सरकार पौधा लगाओ, पर्यावरण बचाओ का नारा दे रही है,* वहीं ढीमरखेड़ा तहसील में लकड़ी माफिया बेखौफ होकर हरे-भरे सागौन के पेड़ों को निगल रहा है। ताजा मामला ग्राम पाली के बरहा टोला का है, जहां वन और राजस्व विभाग की आंखों के सामने बेशकीमती सागौन के पेड़ काटकर लाखों की लकड़ी गायब कर दी गई।
ग्रामीणों के मुताबिक यह काम रातों-रात नहीं, बल्कि खुलेआम किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिना विभागीय मिलीभगत के सागौन जैसे प्रतिबंधित पेड़ों का कटना और परिवहन संभव है?
*जांच के दायरे में 3 बड़े बिंदु*
अनुमति का खेल नियमानुसार सागौन का एक भी पेड़ काटने के लिए वन विभाग और कलेक्टर की अनुमति लेना अनिवार्य है। ग्रामीणों का सवाल है कि क्या बरहा टोला में काटे गए पेड़ों की कोई अनुमति ली गई थी? अगर हां, तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
लकड़ी कहां गई? काटी गई लकड़ी सबसे बड़ा सबूत है। बिना टी.पी. (परिवहन पास) के सागौन की लकड़ी एक कदम भी नहीं ले जाई जा सकती। आखिर यह लकड़ी किस आरा मशीन पर गई और किसकी शह पर गई? यह जांच से ही साफ होगा।
. जमीन किसकी पेड़ वन भूमि पर थे या राजस्व भूमि पर? इसका खुलासा राजस्व रिकॉर्ड से ही होगा। बिना खसरा-नक्शा देखे सच्चाई दबाई जा सकती है।





